Home हिन्दी भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’

भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मैं कवि हूँ, लोगों को साहस बँधाता हूँ, हौसला देता हूँ, उत्साहित करता हूँ ! पर आख़िरकार हूँ तो आदमज़ात ही ! कई बार साधारण मनुष्यों की तरह ही हताश होता हूँ, स्वार्थी-असहमतियों की आयोजित भीड़ के अनर्गल, अश्लील, बेबुनियाद और योजनाबद्ध हमलों से आहत भी होता हूँ ! किताब के पन्नों की ख़ुशबू के ज़िंदादिल नशे के सिवा कोई और नशा ज़िंदगी में कभी रहा नहीं! सो ऐसे चुनौतीपूर्ण पलों के दौरान जिन कुछ बुज़ुर्गों की किताबों के साये में ख़ुद को हर बार ज़िंदा होने के सबूतों के साथ दुहराता हूँ उनमें से मेरे एक पूर्वज, दिनकर जी का आज जन्मदिन है! यानी आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जयंती है।

साहित्य संसार को अपनी प्रकाशवाही रचनाधर्मिता से आलोकित करने वाले इस अद्वितीय शब्द साधक की साधना सभी साहित्यानुरागियों के लिए एक आदर्श लीक मानी जाती है। “कुरुक्षेत्र” और “रश्मिरथी” में पौरूष की प्रखर आग रचने के साथ साथ “उर्वशी” में अनुराग के अंगराग की वह स्वर्गिक कोमल-कांति सिर्फ़ दिनकर ही दिखा सकते थे!

विगत कुछ वर्षों से आज की तारीख़ को मैं “दिनकर दिन” के रूप में मनाता रहा हूँ। इस वर्ष भी तर्पण के माध्यम से हिंदी साहित्य के इस परम पावन प्रकाश स्तंभ की प्रदक्षिणा करते हुए अपने शब्द पूर्वज को अपना कृतज्ञ प्रणाम प्रेषित कर रहा हूँ।

दिनकर जी की प्रखर काव्यदृष्टि

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी के काव्य-कर्म की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यह है कि उसमें सृजन के विविध रंग शामिल हैं। चाहे रश्मिरथी जैसे पौराणिक पात्र पर अपनी प्रखर काव्यदृष्टि डालकर उसे पर्याप्त सम्मान दिलाना हो या फिर किसी सामर्थ्य सिद्ध सम्राट पुररवा की प्रणय याचना को एक प्रांजल भाषा के साथ समाज के सम्मुख प्रस्तुत करना, दिनकर हर स्तर पर एक सिद्ध शब्द साधक की भाँति अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शित करते दिखाई पड़ते हैं।


जिसमें शक्ति विजय की

आज जब चीन-निशा का अंधकार भारत के आत्मसम्मान पर प्रहार कर रहा हो, जब नापाक पाक की गिद्धदृष्टि महर्षि कश्यप की पुण्यभूमि पर टिकी हो, तब आज महाकवि दिनकर जी का यह शब्द-उद्घोष जो मर्यादा पुरुषोत्तम सियावर रामचंद्र के सागरसेतु संकल्प के रूप में गूँजा था, न केवल सुनना आवश्यक है बल्कि दुहराना भी ! हर हिंदुस्तानी के होंठों पर यह गान समय की माँग है –


मंजिल दूर नहीं है

अगर कभी मुश्किलों की फौज मज़बूत इरादों को पस्त करने लगे, सकारात्मकता का स्वर निराशा के माहौल में क्षीण होने लगे और रास्तों की थकन यात्रा के संकल्प को डिगाने लगे तो ऐसे विपरीत समय में महज़ किसी एक गीत के ज़रिए पाठकों को संबल देने की शक्ति दिनकर की सबसे बड़ी पहचान है


रात यूँ कहने लगा

आज पूरी दुनिया एक त्रासद दुर्योग से गुज़र रही है। इसलिए संकट की इस घड़ी में सदिच्छा और संकल्प के ध्वजवाहक दिनकर की कविताएँ आज और भी अधिक प्रासंगिक हो चुकी हैं। कोरोना की अहंकारी आहट से आहत हम सबको यह पूरा दिन ‘दिनकर दिन’ के रूप में मनाने के बाद आज सोने से पहले सकारात्मकता के सुर से सजा दिनकर जी का यह गीत जरूर सुनना चाहिए –

1 COMMENT

  1. दिवाकर से उज्जवलित “दिनकर दिन”पर आपके लिखे शब्दों ने ये सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र कवि दिनकर जी की रचनाएँ समय चक्र के साथ सदैव प्रसांगिक रहेंगीं।
    उत्कृष्ट ब्लाग लिखा है सर आपने दिनकर जी के उत्कृष्ट लेखन की तरह ही।
    यही सच्चा तर्पण भी है दिनकर जी को🙏🏻

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